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नया क्या?

रमणिका फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच के सहयोग से साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य सम्मेलन 2005 रांची (झारखंड) के यादगार लम्हें

साहित्य अकादेमी सभागार में दलित लेखक संघ और शिल्पायन द्वारा आयोजित
दलित हस्तक्षेप एवं स्त्री विमश
1857 का सच
1857 का संग्राम भारत का प्रथम स्वतंत्राता संघर्ष था या स्वत:स्फूर्त सिपाही विद्रोह या धर्मयुध्द अथवा जैसा कि आजकल कहा जा रहा है,
हमने इस पुस्तक में आदिवासी अभिव्यक्ति का दस्तावेजश् तैयार करने की चेष्टा की है ताकि विभिन्न भाषा-भाषी आदिम जनजातियों की सोच-समझ और विचार शृंखला को हिन्दी जगत के रू-ब-रू लाया जा सके! वे क्या सोच रहे हैं? यह जाना जा सके! कितना सफल हुए हैं हम, यह तो पाठक वर्ग ही बताएगा। सत्ता पक्ष या वर्चस्व रखनेवालों की मनोवृत्ति और आदत होती है कि केवल वे ही अपनी बात कहें और दूसरे उसे सुनें और उस पर अमल करेंदूसरे पक्ष के लोग क्या सोचते हैंयह जानने की मनृत्ति बहुत ही कम लोग रखते हैं, खासकर भारतीय लोगचूँकि भारतीय मानस जनतंत्रा नहीं राजतंत्रा का आदी रहा है। हम
न जाने किस मिट्टी की बनी थी कि घर-गिरस्ती, चूल्हा-चौका रास नहीं आया। औरत थी मगर 'गुलामी का आनन्द' नहीं 'स्वतन्त्राता का खतरा' रास आया। होश सँभालने के बाद वही किया, जो मन-मिजाज को जँचा। अपना भला-बुरा खुद तय किया। अपनी जिम्मेवारी खुद उठाई और जवाबदेही से कभी मुकरी नहीं। बड़ी हुई तो घर बन्दीगृह लगने लगा...

 

 

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