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पातियां प्रेम की - अनुक्रम

पातियां प्रेम की

मैं और तुम
किसको आवाज दूँ
गुरुत्वाकर्षण
तुम साथ देते तो
चूमें गगन साथ-साथ
तुम्हारा समर्पण
प्लेटफार्म पर
तुम्हें पाना
मेरी उम्र के वीरानों में चहक उठा पक्षी
कबूतर किसी की याद का
एक सफेद गंध
तुम पास होते तो
जो जिये थे तुम्हारे साथ मैंने
पहले तो
बांध लो
ओ मेरे ज्योतिर्मय
प्रतीक्षा
आंखें
काश! निष्ठुर मौन टूटे
पर रात में
सांझ उतर आई
सागर-सा प्यार
प्यार कर लेने दो
कचनारों की फुनगियों से
एहसास
मुझसे तुझ तक
मैं एक खोज निरंतर
बांध पर तुमको न पाई
तुम मुझ पर छाये चले गए
निर्मम न उन्हें तुमने जाना
आज फिर से लौट आई
कल रात
कजरारी आंखें
ऐ मेरे दोस्त
याद
ऐ मेरे हमसफर
दूरी
कूल मन के लांघती है
अमिट प्यास
मैं और तुम

हमहू बिन पाखी उड़े के चाही?
तू घर नाय एलेय
पेकची के पत्तो-सा
करिया पहाड़
हमहूं बिन पाखी उड़े के चाही

मेरी प्रिय जिंदगी
रात एक युकलिप्टस
कैसे गुनगुनाउं
कहां है वह प्रकृतिजयी
खूबसूरत सोच की तलाश में
प्रेम-पाती
वहीं की वहीं
मुझे कुछ कहना चाहिए
अच्छा लगता है
आदिम और प्रकृति
कच्ची दीवारें
अर्थ
कफन
सम्मोहन
साये
पटरी के पत्थर
मिलन
अंकुर
पंछी अनुभव का
कुछ सपने
फुसफुसाहट
स्मृति का सैलाब
बस प्यार करती हूं
मैंने सपनों से कहा
आकाश के गीत
निर्माण
अधलेटी
स्वीकार करो
प्यार के दो गीत चुप-चुप
'एकेले' ही हम रहे पर जिंदगी भर
यादों की जोगन
रस-भंग
अनाम चित्रा बेनाम कथा
समर्पित
अकेलेपन के चमगादड़

मेरी प्रिय जिन्दगी


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